मकर संक्रांति का इतिहास भारत की प्राचीन परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यह त्योहार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने का प्रतीक है, जिसे सौर कैलेंडर के आधार पर मनाया जाता है। इसका उल्लेख वैदिक ग्रंथों, पुराणों और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है।
मकर संक्रांति का इतिहास हड़प्पा सभ्यता और वैदिक काल तक जाता है। यह त्योहार कृषि और फसल कटाई के साथ जुड़ा हुआ है। भारत में इसे फसलों की कटाई के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा का विशेष महत्व है। यह दिन सूर्य के उत्तरायण (उत्तर की ओर गति) होने का प्रतीक है। इसे शुभ माना जाता है, क्योंकि इस दिन से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं।
महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए मकर संक्रांति का दिन चुना था, क्योंकि इसे "देवताओं का दिन" माना जाता है और इस दिन मृत्यु प्राप्त करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर असुरों का अंत कर उनके सिरों को मंदार पर्वत के नीचे दबाया था। इस दिन को असुरों पर देवताओं की विजय के रूप में भी मनाया जाता है।
भारत के विभिन्न भागों में मकर संक्रांति को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है: तमिलनाडु मे पोंगल, पंजाब मे लोहड़ी, गुजरात मे उतरायण और असम मे बिहू के नाम से जाना जाता है।
मकर संक्रांति न केवल सूर्य की पूजा और फसल कटाई का उत्सव है, बल्कि यह समाज में मेलजोल और आपसी सौहार्द का संदेश भी देता है।